23 March 2023 HINDI Murli Today | Brahma Kumaris

Read and Listen today’s Gyan Murli in Hindi

22 March 2023

Morning Murli. Om Shanti. Madhuban.

Brahma Kumaris

आज की शिव बाबा की साकार मुरली, बापदादा, मधुबन।  Brahma Kumaris (BK) Murli for today in Hindi. SourceOfficial Murli blog to read and listen daily murlis. पढ़े: मुरली का महत्त्व

“मीठे बच्चे - देही-अभिमानी बनो तो पुराने जगत से नाता तोड़ने और नये जगत से नाता जोड़ने की खूबी सहज आ जायेगी, एक बाप से लव जुट जायेगा''

प्रश्नः-

किन बच्चों का बुद्धियोग पारलौकिक मात-पिता से सदा जुटा हुआ रह सकता है?

उत्तर:-

जो जीते जी मरकर ईश्वरीय सर्विस पर तत्पर रहते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते भी सभी का बुद्धियोग बाप से जुड़ाने की सेवा करते हैं, बाप से जो रोशनी मिली है वह दूसरों को देते हैं, स्वर्ग का मालिक बनाने के लिए पावन बनने की युक्ति बताते हैं – उनका बुद्धियोग स्वत: बाप से जुटा रहता है।

♫ मुरली सुने (audio)➤

गीत:-

कौन है पिता, कौन है माता..

ओम् शान्ति। गीत का अर्थ क्या है? कहते हैं जगत के (लौकिक) माता-पिता को, मित्र सम्बन्धियों आदि सबको छोड़ो और बुद्धियोग अपने सच्चे मात-पिता, जो सृष्टि के रचयिता हैं, उनसे लगाओ। यह जो माता, पिता, मित्र-सम्बन्धी आदि हैं, उनसे अब नाता तोड़ना है और एक से नाता जोड़ना है। उनको भी मात-पिता कहा जाता है। तुम मात-पिता हम बालक तेरे.. वह सब एक को कहते हैं, वह लौकिक माँ बाप तो सबके अलग-अलग हैं। यह सारे भारत अथवा सारी दुनिया का मात-पिता है। तो पारलौकिक मात-पिता का बनना और लौकिक मात-पिता, मित्र-सम्बन्धियों को छोड़ना – इसके लिए देही-अभिमानी बनने का ज्ञान चाहिए। जब तक देही-अभिमानी नहीं बनते हैं तब तक छूटना बड़ा मुश्किल है। इस पुराने जगत से नाता तोड़ना है और नये जगत से नाता जोड़ना है – यही खूबी है। हद के एक घर से नाता तोड़ हद के दूसरे घर से नाता जोड़ना तो बहुत सहज है। हर जन्म में तोड़ना और जोड़ना होता है। एक मात-पिता, मित्र-सम्बन्धियों को छोड़ा दूसरा लिया। एक शरीर छोड़ा तो फिर मात-पिता, मित्र-सम्बन्धी, गुरू आदि सब नये मिलते हैं। यहाँ तो है जीते जी मरने की बात। जीते जी पारलौकिक मात-पिता की गोद में आना है। इस कलियुगी जगत के मात-पिता आदि सबको भुलाना है। यह बाप तो है फिर माता भी कैसे है? यह है गुह्य बात। बाप यह शरीर धारण कर इनसे फिर अपना बच्चा बनाते हैं। परन्तु कई बच्चे यह बात घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। अज्ञान काल में कभी माँ-बाप को भूलते नहीं हैं। इस माँ-बाप को भूल जाते हैं क्योंकि यह है नई बात। इस मात-पिता से बुद्धियोग जोड़ना है फिर सर्विस में तत्पर रहना है। जैसे बाप को सर्विस का फुरना रहता है, ऐसे बच्चों को भी रहना चाहिए। कहते हैं भगवान को फुरना हुआ नई दुनिया रचें। तो यह कितना बड़ा फुरना है! बेहद के बाप को बेहद का फुरना रहता है – सबको पावन बनाना है। उस पावन दुनिया स्वर्ग के लिए राजयोग सिखाना है। कितने को सिखलाना है! सबका बुद्धियोग बाप के साथ जोड़ना है। यही धन्धा हम बच्चों का है। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते तुम बच्चे सर्विस करके दिखाओ।

संन्यासियों को फुरना रहता है हम कोई को काग विष्टा समान सुख से छुड़ावें, पवित्र बनायें। उन पर भी रेसपान्सिबिल्टी रहती है – किसको वैराग्य दिलाए पवित्र बनायें। वह समझते हैं घरबार छोड़ना है। यह नहीं समझते कि पतित दुनिया को छोड़ना है। यह तो जब बाप आकर पावन दुनिया का साक्षात्कार कराते हैं तब हम पतित दुनिया से नाता तोड़ते हैं। फिर भी वह अपने को जवाबदार समझ घरबार छोड़ कितने को वैराग्य दिलाकर पवित्र बनाते हैं। महिमा तो उन्हों की भी गाई जाती है। यह संन्यास धर्म नहीं होता तो भारत और ही काम चिता पर जलकर भस्म हो जाता। अब वह रजोगुणी संन्यास स्थापन करने वाला कौन और यह सतोप्रधान संन्यास स्थापन करने वाला कौन – यह बाप बैठ समझाते हैं। उनका हेड था शंकराचार्य, उनके भी कितने फालोअर्स होंगे! लाखों करोड़ों की अन्दाज में होंगे। वह पवित्र नहीं होते तो उनकी प्रजा भी वृद्धि को नहीं पाती। तो यह संन्यासियों ने भी अच्छा ही किया है। पहले नम्बर में देवतायें गिने जाते हैं, दूसरे नम्बर में संन्यासी। सारा मदार है ही पवित्रता पर। दुनिया को पवित्र से अपवित्र फिर अपवित्र से पवित्र बनना ही है। सतयुग से लेकर जो भी ड्रामा में पास्ट हुआ है, वह नूंध है। भक्ति मार्ग में साक्षात्कार आदि जो कुछ होता है सेकेण्ड बाई सेकेण्ड, वह फिर कल्प बाद होगा। ड्रामा में यह सब नूंध है। ड्रामा चक्र को समझना है। ऐसे नहीं बैठ जाना है कि ड्रामा में जो होगा। ड्रामा में एक्टर्स तो सब हैं। तो भी हर एक अपनी आजीविका के लिए पुरुषार्थ जरूर करते हैं। पुरुषार्थ बिगर रह न सकें। भल कई मनुष्य समझते भी हैं यह नाटक है, हम परमधाम से आये हैं पार्ट बजाने। परन्तु विस्तार से समझा नहीं सकते हैं। पहले किस धर्म वाले आते हैं, सृष्टि कैसे रची जाती है, जानते नहीं। सृष्टि नई रची जाती है वा पुरानी सृष्टि को बाप आकर नया बनाते हैं – यह मालूम न होने कारण उन्हों ने प्रलय दिखाकर फिर नई सृष्टि दिखा दी है। बाप आकर इन बातों की रोशनी देते हैं। फिर तुम भी औरों को रोशनी देने के रेसपान्सिबुल हो। कितनी सर्विस है! जैसे बाप ने तुमको मुक्ति-जीवनमुक्ति में आने का मार्ग बताया है, जिस मार्ग के लिए ही आधाकल्प भक्ति मार्ग में ठोकरें खाई हैं। तो बेहद के बाप को फुरना रहता है कि हम अपनी सैलवेशन आर्मी की वृद्धि कैसे करें? सभी को रास्ता कैसे बतायें?

तुम बच्चे सबको बताओ कि बाप आया हुआ है राजयोग सिखलाने, कल्प पहले मुआफिक। जिसको ही शिवाए नम: कहते हैं। जो है सभी से ऊंच ते ऊंच परमधाम में रहने वाला। हम सभी आत्मायें भी वहाँ निवास करती हैं। आत्मा को हमेशा इमार्टल कहा जाता है। वह कब जलती-मरती नहीं। हर एक आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। अपनी आत्मा को देखो वा जो मुख्य हैं उनको देखो। झाड़ को जब देखा जाता है तो मुख्य फाउन्डेशन और टाल-टालियों को भी देखा जाता है। पत्ते तो अथाह होते हैं उनको गिनती नहीं किया जा सकता। टाल-टालियां गिनती कर सकते हैं। तो बरोबर इस झाड़ में फाउन्डेशन हम देवी देवताओं का है। अभी फाउन्डेशन ही सड़ गया है। जैसे बनेनट्री झाड़ का फाउन्डेशन सड़ गया है। फिर भी शाखायें कितनी निकली हुई हैं! शाखाओं से भी पत्ते निकलते रहते हैं। तो यह भी बेहद का कितना बड़ा झाड है! तुम बच्चे भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हो। ऐसे नहीं कि सारा दिन किसकी बुद्धि में यह चिन्तन चलता है। सभी प्वाइंट्स एक ही समय बुद्धि में फिरना मुश्किल है। फिर भी जो विचार सागर मंथन करने वाले हैं उनकी बुद्धि में तो टपकता ही होगा। झाड़ बुद्धि में है तो बीजरूप बाप भी याद रहता है। हम भी वहाँ के रहने वाले हैं फिर इस झाड़ में हम ही आलराउन्ड आते हैं, आदि से अन्त तक। जब तुम पतित जड़जड़ीभूत अवस्था में आते हो तो सारा झाड़ आ जाता है। पहले-पहले जो थे वह भी अब पुराने हैं। पिछाड़ी वाली टाल टालियां भी पुरानी हैं। जो सर्विसएबुल हैं उन्हों को ओना रहता है हम बाबा के मददगार हैं, मनुष्यों को फिर से सो देवता बनाने के लिए। यह समझाना पड़ता है। तुम सो देवता थे, सो क्षत्रिय बनें। 84 जन्मों की जन्मपत्री तुम ही बता सकते हो। तो यह बातें जब बुद्धि में टपकती रहेंगी तब किसको समझा सकेंगे। चिन्तन चलना चाहिए – हम बच्चे बाबा के साथ मददगार हैं। तो बुद्धि में आना चाहिए कि हम किसको ड्रामा का राज़ कैसे समझायें? उन्हों का योग बाप के साथ कैसे जुटायें? मनुष्य से देवता बनाने का पुरुषार्थ करायें अर्थात् बाप से बेहद का वर्सा लेने का मार्ग बतायें। जिनको बाप द्वारा मार्ग मिला होगा वही बतायेंगे। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं अथवा मुक्ति-जीवनमुक्ति के गेट्स खोलते हैं। ऐसे सारा दिन विचार सागर मंथन करना चाहिए और स्वभाव भी बहुत मीठा धारण करना है। किसके भाव-स्वभाव में जलना वा मरना नहीं है। सहन करना है। अपनी सर्विस करनी है। जितना हो सके सर्विस में टाइम देना चाहिए। अपने से पूछना है हम बाबा-बाबा कहते हैं, बाबा को तो बेहद सर्विस का ओना रहता है, मैं बाबा का बच्चा क्या कर रहा हूँ! मुझे कितनी सर्विस करनी चाहिए? टाइम तो बहुत मिलता है। तरस पड़ना चाहिए। बिचारे सभी बाप से बिछुड़े हुए हैं। धक्का खाते रहते हैं। पाप करते रहते हैं। बाप से बेमुख कर सबको मुंझाते रहते हैं।

तुम ब्राह्मणों का काम ही है सबको ज्ञान सुनाए सम्मुख लाना। तुम ब्राह्मण हो गीता के भगवान के सच्चे-सच्चे बच्चे। तुमको अथॉरिटी मिली हुई है। तुम्हारी बुद्धि में गीता का ही ज्ञान है। जो समझा नहीं सकते उनको हम ब्राह्मण नहीं कह सकते। हाफ कास्ट वा क्वार्टर कास्ट कहेंगे। नाम ब्राह्मण है, धन्धा शूद्रपने का करते हैं। बुद्धि शूद्रपने की है। अजमेर में पुष्करनी ब्राह्मण रहते हैं तो वह गीता शास्त्र आदि सुनाने वाले होते हैं। उन्हों का धन्धा ही यह है। धामा खाना उनका काम नहीं है। उनका सिर्फ काम है शास्त्र सुनाए दक्षिणा लेना। अब तुम तो हो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण, बेहद बाप के बच्चे। प्रजापिता ब्रह्मा बेहद प्रजा का बाप है ना और शिवबाबा है सभी आत्माओं का बाप। उनका निवास स्थान है परमधाम में। वही पतितों को पावन बनाने वाला है, इसलिए सारी दुनिया उनको याद करती है, ओ गॉड कहते हैं तो निराकार ही बुद्धि में आता है। परन्तु गुरूओं की जंजीरों में फंसे हुए हैं। जिन देवताओं की पूजा करते हैं उनके आक्यूपेशन का पता नहीं है। वह भी जैसे गुड्डे गुड़ियां समझ पूजा करते हैं। आक्यूपेशन जानते नहीं इसलिए गुड़ियों की पूजा कहा जाता है। तो कितना फ़र्क रहता है! ढेर के ढेर मूंझे हुए हैं। देवताओं की सूरत और सीरत, मनुष्य की सूरत और सीरत में दिन-रात का फ़र्क है। मनुष्य गाते हैं – आप सर्वगुण सम्पन्न. .. हम नींच पापी हैं। अगर ऐसा कहते हैं तो भला उनको ऐसा बनाने वाला कौन था? अभी तो बरोबर नर्क है फिर स्वर्ग का मालिक क्या हम बन सकते हैं? यह ख्याल कभी मनुष्यों को उठता नहीं है। तुम बच्चों को कभी यह ख्याल थोड़ेही उठा होगा कि हम ऐसे कब बनेंगे? सिर्फ भक्ति करते रहे। अभी तुम जानते हो हमको सो देवता बनना है। राजधानी में ऊंच पद पाना है इसलिए पुरुषार्थ करते हैं। अन्दर आना चाहिए अगर हमारा शरीर छूट जाए तो हम किस पद को पायेंगे? तुम पूछ भी सकते हो – अगर हम मर जायें तो क्या पद पायेंगे? तो बाबा झट बता देंगे – तुम पाई पैसे का पद पायेंगे वा 8 आने का, 12 आने का वा कौड़ी का पद पायेंगे। प्रजा को कौड़ी पद कहेंगे। दिल दर्पण में अपनी शक्ल देखो – कोई बन्दरपना तो नहीं है? अशुद्ध अहंकार है नम्बरवन। काम-क्रोध को भी जीत लेवे परन्तु देह-अभिमान है पहला नम्बर दुश्मन। देही-अभिमानी बनने से ही फिर और विकार ठण्डे होंगे। देही-अभिमानी तब बनें, जब बाप के साथ लव जुटे। देह-अभिमानी का लव जुट न सके। तो देह-अभिमान छोड़ने में बड़ी मेहनत चाहिए। देही-अभिमानी बड़े हर्षित रहते हैं। देह-अभिमानी का चेहरा मुर्दों जैसा रहता है। तो पहली मुख्य बात है देही-अभिमानी बनना, तब बाप भी मदद करेगा। निर्विकारी तो बहुत रहते हैं परन्तु मैं आत्मा हूँ, बाप की याद रहे, यह घड़ी-घड़ी भूल जाता है। इसमें फेल हो जाते हैं। अशरीरी नहीं बनेंगे तो वापिस कैसे जायेंगे? सर्विस का बहुत फुरना रहना चाहिए – जिससे बहुत मनुष्यों का कल्याण हो, देह-अभिमानी कहाँ भी जायेगा तो फेल हो आयेगा। देही-अभिमानी कुछ न कुछ तीर लगाकर आयेगा। महसूस करेंगे कि फलाने ने बात तो ठीक कही थी। योग जुट जाए तो सर्विस का फुरना भी हो। उसमें पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। जास्ती तीक-तीक से तंग हो जायेंगे। पहले शिवाए नम:, तीन तबका भी समझाना है। एक निराकारी दुनिया जहाँ परमपिता परमात्मा और आत्मायें रहती हैं। बाकी है स्थूल और सूक्ष्मवतन। स्वर्ग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, अब नहीं है, फिर हिस्ट्री रिपीट होगी। आगे कलियुग था फिर सतयुग हुआ अब फिर कलियुग की हिस्ट्री रिपीट हो रही है। तो अब फिर सतयुग की हिस्ट्री भी रिपीट होगी ना। इसमें ही मजा है। बहुत अच्छी प्वाइंट्स हैं। अच्छा!

ब्राह्मण कुल भूषण सभी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार :

1) किसके भाव-स्वभाव में जलना मरना नहीं है। अपना स्वभाव बहुत-बहुत मीठा बनाना है। सहनशील बनना है।

2) बाप का खिदमतगार बनने के लिए विचार सागर मंथन करना है। बुद्धि में ज्ञान का ही चिंतन करते रहना है। देही-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है।

वरदान:-

जहाँ संबंध होता है वहाँ याद स्वत: सहज हो जाती है। सर्व संबंधी एक बाप को बनाना ही सहजयोगी बनना है। सहजयोगी बनने से माया को सहज विदाई मिल जाती है। जब माया विदाई ले लेती है तब बाप की बंधाईयां बहुत आगे बढ़ाती हैं। जो हर कदम में परमात्म दुआयें, ब्राह्मण परिवार की दुआयें प्राप्त करते रहते हैं वह सहज उड़ते रहते हैं।

स्लोगन:-

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